Poem by Ramdhari Singh Dinkar on this "National Youth Day"

सच है, विपत्ति जब आती है,

कायर को ही दहलाती है,

सूरमा नही विचलित होते,

क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,

काँटों में राह बनाते हैं

मुँह से न कभी उफ़ कहते हैं,

संकट का चरण न गहते हैं,

जो आ पड़ता सब सहते हैं,

उद्योग-निरत नित रहते हैं,

शूलों का मूल नसाते हैं,

बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।



है कौन विघ्न ऐसा जग में,

टिक सके आदमी के मग में?

खम ठोक ठेलता है जब नर,

पर्वत के जाते पाँव उखड़,

मानव जब ज़ोर लगाता है,

पत्थर पानी बन जाता है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर,

है छिपे मानवों के भीतर,

मेंहदी में जैसे लाली हो,

वर्तिका-बीच उजियाली हो,

बत्ती जो नही जलाता है,

रोशनी नहीं वह पाता है।

Replies (9)

 

 

ध्वजा वंदना

 
  नमो, नमो, नमो।

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
नमो नगाधिराज - शृंग की विहारिणी!
नमो अनंत सौख्य - शक्ति - शील - धारिणी!
प्रणय - प्रसारिणी, नमो अरिष्ट - वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा - प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!

हम न किसी का चाहते तनिक अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर-फहर ओ केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

तार-तार में हैं गुँथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिंदुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

- रामधारी सिंह 'दिनकर'

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों

कहता हूँ, ओ मखमल-भोगियो।
श्रवण खोलो,
रुक सुनो, विकल यह नाद
कहाँ से आता है।
है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे?
वह कौन दूर पर गाँवों में चिल्लाता है?

जनता की छाती भिंदे
और तुम नींद करो,
अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूँगा।
तुम बुरा कहो या भला,
मुझे परवाह नहीं,
पर दोपहरी में तुम्हें नहीं सोने दूँगा।।

हो कहाँ अग्निधर्मा
नवीन ऋषियों? जागो,
कुछ नई आग,
नूतन ज्वाला की सृष्टि करो।
शीतल प्रमाद से ऊँघ रहे हैं जो, उनकी
मखमली सेज पर
चिनगारी की वृष्टि करो।

गीतों से फिर चट्टान तोड़ता हूँ साथी,
झुरमुटें काट आगे की राह बनाता हूँ।
है जहाँ-जहाँ तमतोम
सिमट कर छिपा हुआ,
चुनचुन कर उन कुंजों में
आग लगाता हूँ।

आग की भीख

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज़ रो रहा है?

दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का शृंगार माँगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नही बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?

आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तम वेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अंधेर हो रहा है।

निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ता विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमान आरजू की लाशें निकल रही है।
भीगी खुली पलकों में रातें गुजारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,

इनके लिए कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफ़ान माँगता हूँ।

आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ शृंगी ज़रा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।

आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उस पर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।

हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनल विशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद में भगवान माँगता हूँ।

Nice post .....thanks for sharing......!!!

Originally posted by : Ankur - Big fan of Caclub

Nice post .....thanks for sharing......!!!

Amazing  Poems dear. Keep Sharing

He used to be my fav. poet during 10th class. Inki bahut kavita mere course mein thi.. 

i hav nt read even one of them in my childhood ....thx 4 sharing :)

 

Amazing  Poems .........Keep Sharing:)


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