A Poem of Javed Akhtar on Terrorism...

महावीर और बुद्ध की,
नानक और चिश्ती की,और गाँधी की धरती पर,
मैं जब आतंक के ऐसे नज़ारे देखता हूँ तो,
मैं जब अपनी ज़मीं पर अपने लोगों के लहू के बहते धारे देखता हूँ तो,
मेरे कानों में जब आती हैं उन मज़बूर ग़म से लरज़ती माओं की चीखें,
कि जिनके बेटे यह कहकर गए थे, शाम से पहले ही घर लौट आएँगे हम तो,
मैं जब भी देखता हूँ सूनी और उजड़ी हुई मांगें,
ये सब हैरान से चेहरे, ये सब भींगी हुई आँखें,
तो मेरी आँखें हरसू ढूँढती हैं उन दरिन्दों को,
जिन्होंने ट्रेन में, बस में, जिन्होंने सडको में, बाजारों में बम आके हैं फोड़े,
जिन्होंने अस्पतालों पर भी अपनी गोलियाँ बरसाई, मंदिर और मस्जिद तक नहीं छोड़े,
जिन्होंने मेरे ही लोगों के खूँ से मेरे शहरों को रँगा है,
वो जिनका होना ही हैवानियत की इंतहा है,
मेरे लोगों जो तुम सबकी तमन्ना है, वही मेरी तमन्ना है,
कि इन जैसे दरिंदों की हर एक साज़िश को मैं नाकाम देखूँ,
जो होना चाहिए इनका मैं वो अंज़ाम देखूँ ,
मगर कानून और इंसाफ़ जब अंजाम की जानिब इन्हें ले जा रहे हों तो,
मैं इनमें से किसी भी एक से इक बार मिलना चाहता हूँ.

मुझे यह पूछना है,
दूर से देखूँ तो तुम भी जैसे एक इंसान लगते हो,
तुम्हारे तन में फिर क्यूँ भेड़ियों का खून बहता है ?
तुम्हारी साँस में साँपों की ये फुंकार कबसे है ?
तुम्हारी सोच में यह ज़हर है कैसा ?
तुम्हें दुनिया की हर नेकी हर इक अच्छाई से इंकार कबसे है?
तुम्हारी ज़िन्दगी इतनी भयानक और तुम्हारी आत्मा आतंक से बीमार कबसे है?



सुनो आतंकवादी,
मुझे गुस्सा भी आता है, तरस भी आता है तुम पर,
कि तुम तो बस प्यादे हो,
जिन्होंने है तुम्हें आगे बढ़ाया वो खिलाडी दूर बैठे हैं,
बहुत चालाक बनते हैं, बहुत मगरूर बैठे हैं,
ज़रा समझो, ज़रा समझो, तुम्हारी दुश्मनी हम से नहीं हैं,
जहाँ से आए हो मुड़कर ज़रा देखो, तुम्हारा असली दुश्मन तो वहीं हैं,
वो जिनके हाथ में कठपुतलियों की तरह तुम खेले,
वो जिनके कहने पर तुमने बहाए खून के रेले,
तुम्हारे तो है वो दुश्मन, जिन्होंने नफ़रतों का यह सबक तुमको रटाया है,
तुम्हारे तो है वो दुश्मन जिन्होंने तुमको ऐसे रास्ते में ला के छोड़ा है,
जो रास्ता आज तुमको मौत के दरवाज़े लाया है,
यह एक धोखा है, एक अँधेर है, एक लूट है समझो,
जो समझाया गया है तुमको वो सब झूठ है समझो,



कोई पल भर न ये समझे की मैं ज़ज़्बात में बस यूँ ही बहता हूँ,
मुझे मालूम है वो सुन रहे हैं जिनसे कहता हूँ,
अभी तक वक़्त है जो पट्टियाँ आँखों की खुल जाएँ,
अभी तक वक़्त है जो नफ़रतों के दाग धुल जाएँ,
अभी तक वक़्त है हमने कोई भी हद नहीं तोड़ी,
अभी तक वक़्त है हमने उम्मीद अब तक नहीं छोड़ी,
अभी तक वक़्त है चाहो तो ये मौसम बदल जाएँ,
अभी तक वक़्त है जो दोस्ती की रस्म चल जाए,
कोई दिलदार बनके आए तो दिलदार हम भी हैं,
मगर जो दुश्मनी ठहरी तो फिर तैयार हम भी हैं.

--- जावेद अख़्तर
Replies (7)

nice post

nice [post. keep sharing                            

Very Nice, Keep Sharing

Nice post !

what is the  point in all this??

repeated attacks take place again and again and we do the same things ,the same candle marches ...the same debates and same poetries ..........this poetry may be good but cannot bring back those who died nor can erase the scars of the family members of the victims

ज़रा समझो, ज़रा समझो, तुम्हारी दुश्मनी हम से नहीं हैं,
जहाँ से आए हो मुड़कर ज़रा देखो, तुम्हारा असली दुश्मन तो वहीं हैं,
वो जिनके हाथ में कठपुतलियों की तरह तुम खेले,
 
Originally posted by : Ravi Khandelwal

ज़रा समझो, ज़रा समझो, तुम्हारी दुश्मनी हम से नहीं हैं,

जहाँ से आए हो मुड़कर ज़रा देखो, तुम्हारा असली दुश्मन तो वहीं हैं,

वो जिनके हाथ में कठपुतलियों की तरह तुम खेले,

 


kya khub kaha........

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