An Exam cannot decide your life

कोई एक परीक्षा जीवनका फैसला नहीं करती

राहुल आनंद, नई दिल्ली

उम्मीद पर दुनिया कायम है। उम्मीद कभी खत्म नहीं होती तो फिर क्यूं बोर्ड परीक्षा को जीवन का अंतिम परीक्षा समझ कर अपने आप को दोषी ठहराएं। 12वीं के रिजल्ट से जीवन का फैसला नहीं होता। जीवन के सफर में कई मोड़ आते हैं, जो लोग इन बाधाओं को लांघकर आगे बढ़ता है वही सफल होता है। रिजल्ट अच्छा आए या खराब, बच्चों की हौसला अफजाई कीजिए ताकि वह जिंदगी के सफर में हिम्मत से आगे बढ़ता रहे। यह कहना है मनोचिकित्सकों का।

मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख का कहना है कि आशा के विपरीत रिजल्ट से बच्चे आत्महत्या के लिए प्रेरित होते हैं। उसे अपने आप से नफरत होने लगती है। उसके अंदर अजीब सी बेचैनी होती है, जिससे ऊब कर वह कुछ भी कर सकता है। फेल होने वाले ऐसे छात्रों का दर 75 प्रतिशत होता है, जबकि 25 प्रतिशत ऐसे छात्र होते हैं जिनमें असफलता के बाद धीरे-धीरे हीन भाव उत्पन्न होने लगती है। ऐसी स्थिति में माता-पिता की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है।

डॉ. बीएल कपूर अस्पताल के डाक्टर ब्रिगेडियर एस सुदर्शनन का मानना है कि फेल होना किसी को अच्छा नहीं लगता, लेकिन एक परीक्षा जीवन का फैसला नहीं कर सकती और न ही सभी छात्रों का एक सामान रिजल्ट होता है। हर किसी की मंजिल अलग होती है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों की पंसद के हिसाब से आगे की प्लानिंग करने में मदद करनी चाहिए, उन्हें यह बताना चाहिए कि अपनी गलती से सीखे, अपनी कमियां दूर करे, क्योंकि असफलता के दौरान ढूंढी गई खामियों में ही सफलता की कुंजी है।

फोर्टिस अस्पताल की मनोचिकित्सक सुरभि सोनी का कहना है कि जब बच्चों की उम्मीद एकदम से टूट जाती है तो वह ट्रॉमा में जा सकता है, डिप्रेशन का शिकार हो सकता है, सुसाइड का प्रयास भी कर सकता है। ऐसे हालात में बच्चों के प्रति माता-पिता का दायित्व काफी बढ़ जाती है। उन्हें बच्चों के ऊपर अपनी अपेक्षाएं नहीं लादना चाहिए। उसे जितना भी अंक प्राप्त होता है उसी में उसे बधाई दें। उस के साथ मौज मस्ती करें, उसके दोस्तों को बुलाएं, उन्हें मिठाई खिलाएं। साथ में उसे इस बात का एहसास कराएं कि शैक्षणिक योग्यता ही सब कुछ नहीं होता। अगर आप अच्छा करने का संकल्प लें तो किसी भी क्षेत्र में अच्छा कर सकते हैं।

महाराजा अग्रसेन अस्पताल के डॉ. राजीव मेहता का मानना है कि रिजल्ट के बाद अभिभावकों को नेगेटिव टिप्पणी से बचना चाहिए और न ही दूसरे अधिक नंबर लाने वाले बच्चों से तुलना करना चाहिए। ऐसे समय में हर पल बच्चों के साथ रहें, उन्हें समझाएं कि जिंदगी यहीं खत्म नहीं होती। दुनिया में लाखों लोग हैं, जो पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पाए। इसके बावजूद उन लोगों ने अच्छा मुकाम हासिल किया और दूसरे के प्रेरणास्रोत बने चाहे वह सचिन हो या फिर धौनी, सलमान हो या आमिर, इनके उदाहरण देकर समझाएं।

Replies (1)

nice article

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