Aam aadmi in 2011 .....

आज तुम्हे एक ऐसी मैं 
अपनी व्यथा सुनाता हूँ.
सुनो सुनो ये दुनिया वालो,
दिल से मैं लिख जाता हूँ.

एक बार बोला बीवी से,
चलो डार्लिंग चलें बाज़ार,
Salary मिली है मुझको प्यारी,
सामान का बनाओ विचार.

Suit भी ले लो, साड़ी भी ले लो,
सैंडल ले लो ऐ दिदार ,
क्रीम -पाउडर , बालों का गजरा,
इत्र भी ले लो खुशबूदार.

श्रृंगार का सामान भले ही लेना, 
साथ में इतना भूल न जाना,
राशन पहले खरीद कर लाये,
तभी पकेगा घर में खाना.

मिया बीवी बाज़ार गये हम,
हाथ में एक दूजे का हाथ.
दुनिया मेरी रंगीन बड़ी थी,
जब हम दोनों थे एक साथ.

बड़ा ही खुश था बीवी के संग,
पहली बार ये मानी है.
सुनो -सुनो ये दुनिया वालो,
लम्बी मेरी कहानी है.

पैसे लेकर, चौड़े होकर,
बाज़ार चले सीना ताने.
जेब गरम थी नहीं शर्म थी,
हम किसी को क्या जाने.

भीड़ भरे बाज़ार किसी ने,
मुझको धक्का दे डाला.
क्रीम -पाउडर का भाव पूछने,
दुकान चली गयी वो बाला.

किसी तरह भीड़ से उठकर,
पीछे उसके गया दुकान.
राशन की लिस्ट लम्बी ऐसी,
निकल गयी मेरी झूठी शान.

भीड़ में गिरकर हाल बुरा था,
आँखें मेरी भर आई.
हाल में ऐसे देख के मुझको,
चीनी की बोरी शरमाई.

खांड भी उछल -उछल के गिरता,
कोई ले डालो मुझको.
महंगाई ऐसे बढ़ी है,
कैसे खरीदू मैं तुझको.

चायपत्ती आवाज लगाती,
जाओगे मुझे छोड़ कहाँ.
दूध की थैली रेट बढ़ाये,
नाच रही थी यहाँ वहाँ.

चावल क्या मोल आटा भी तोल ,
डालें नाची छमा -छम.
तेल घी का भाव पूछा तो,
मेरा निकला वहाँ पे दम.

मशाले कोने में गरम पड़े थे,
मेरे पास कब आओगे.
नमक की थैली चुंडी काटे,
बिन मेरे कैसे खाओगे.

साग सब्जी की बारी आई ,
आलू प्याज़ था हिस्से में.
और सब्जियां आसमान छूती,
लाल टमाटर गुस्से में.

होश उड़ गये मेरे वहाँ,
लाला ने जब बिल थमाया.
महंगाई से पहले ही हालत ख़राब थी,
अब तो जेब में नोट भी शरमाया.

लाला बोले पैसे लाओ,
राशन अपने घर ले जाओ.
पैसे नहीं है तो मेरे भाई,
खाने के बदले हवा खाओ.

राशन पूरा हुआ नहीं था,
बीवी बोले गुस्से में.
पैसे तो सब खर्च कर दिये,
क्या आया मेरे हिस्से में.

साड़ी की तो बात ही छोड़ो,
suit तक तुमने नहीं लिया.
जरा यह तो बताओ,
मेरी खातिर आज तक तुमने क्या किया.

सैंडल, चप्पल कुछ न मिला है,
इत्र बोले थे खुशबूदार.
तुमसे अच्छा तो तुम्हारा पड़ोसी ,
बीवी का है सेवादार.

मधुर -मधुर लाला संग बातें,
मुझे खरी -खोटी कह डाली .
महंगाई ने ऐसा दर्द दिया है ,
अपनी ही न रही यह घरवाली.

आम आदमी मेरी तरह है,
महंगाई का दर्द झेल रहा है.
दिनों -दिन यह ऐसे बढ़ती,
सर चढ़के यह बोल रहा है.

दिनों दिन महंगाई बढ़ती,
आम आदमी कैसे रहेगा.
नहीं बचा कुछा खाने को तो,
इस संसार में कैसे जियेगा.

आज में हाथ जोड़ के करता,
विनती फिर सरकार से,
अपनी इस जनता को बचा ले ,
महंगाई की मार से.

Replies (3)

i guess nobody liked it :P

really nice poem.....

keep it up

Good one .Thank you Ravi..Keep sharing

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